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नवरात्रि- स्त्रीत्व को समर्पित पर्व

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हम लोग तैयार है माँ जगदम्बा के स्वागत के लिए, स्त्री तत्व को समर्पित है ये नवरात्रि का पर्व। उस परा शक्ति को जो किसी ना किसी रूप में हर वस्तु व जीव में विद्यमान है. जो प्रज्ञा है, क्षमा है, दया है, स्वाभिमान है, जो तृप्ति है, जो देवताओ की क्षुधा को शान्त करने के लिए स्वाहा है ओर दूसरी तरफ स्वधा भी। नारी का वास्तविक स्वरूप प्रेम है. चाहे वो बेटी, पत्नी, बहन या माँ किसी भी रूप में हो। शांति ओर शक्ति का समन्वय सिर्फ करुणा से ही संभव है ओर ये अद्भुत गुण हमे नारी के स्वरूप में ही मिलते है। 

आज के समय का दुर्भाग्य देखिये की किस तरह हमने पूज्या को भोग्या बना दिया। कोई दिन ऐसा नही गुजरता यहाँ किसी नारी की अस्मिता से छेड़छाड़ ना होती हो. बसों में, आफिस में, स्कूल ,मंदिरों ओर घरो तक मे हर रोज इनका तिरस्कार किया जाता है। ऐसे जघन्यतम अपराध की सुनने में भी कष्ट होता है. बलात्कार के बाद पाषाण हो चुकी देह को भी नहीं छोड़ा जाता। ऐसे समय मे सिर्फ अन्न का उपवास या निज शरीर शुद्धि का उद्देश्य नही अपितु कुत्सित मानसिकता के दमन का अनुष्ठान होंना चाहिए। 

नवरात्रि के दिनों हम देवी के नो रूपो की उपासना करते है। कितना सुंदर भाव है जो भगवती हमारे जीवन मे पहले दिन पुत्री (शैलपुत्री) के रूप में आती है वो ही नवे दिन सभी सुखों को देने वाली सिद्धिदात्री हो जाती है। 

हमे याद रखना होगा कि जब हम आद्या स्वरूपनी माँ से रुप, जय ओर यश की कामना करें तो साथ ही काम व क्रोध के संहार की याचना भी करे। इसमें तनिक भी संदेह नही की देवी प्रकृति रूप में विश्व के सभी मनोरथ पूरे करती है तो साथ ही हमे भी कृतज्ञता स्वरूप उसका सम्मान ओर सरंक्षण करना चाहिए। 

ये नवरात्रि का पर्व हम सभी के जीवन मे मंगल व शांति लाये ऐसी मेरी शुभकामनाये।

प्रणाम

#Gauravkansal

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कंजक

मुनिया अगले महीने पूरे नौ साल की हो जाएगी. सांवली सूरत, बड़ी काली आंखे, घुँघराले बाल और हर दम चेहरे पर मुस्कान। दूसरी कक्षा तक पढ़ने के बाद पैसों की तंगी की वजह से स्कूल छूट गया तो अपनी माँ के साथ वो दूसरो के घर मे चौका बर्तन के काम मे हाथ बंटाने लगी। काम के बाद घर आकर अपने छोटे भाई टिंकू को पढ़ाती। टिंकू अभी पांच साल का था और उसने बस स्कूल जाना शुरू ही किया था। मुनिया का अक्षर ज्ञान बहुत अच्छा था और दस तक के पहाड़े तो उसे जुबानी याद थे। उम्र से कही ज्यादा सयानी थी मुनिया या कहो कि अपने पापा के पिछले साल सड़क हादसे में गुजरने के बाद मानो घर की जिम्मेदारियों ने उसे ज्यादा समझदार बना दिया हो। लाला का हिसाब हो, राशन की दुकान से मिट्टी का तेल या मोटा चावल लाना हो, सुबह 5 बजे गली के नुक्कड़ से पानी भरना हो हर काम मे बिल्कुल कुशल। मुनिया अपने भाई को उस स्कूल में पढ़ाना चाहती थी यहाँ मिश्राइन जी का बेटा पढ़ता है। मुनिया अपनी माँ के साथ मिश्राइन जी के यहां चौका बर्तन करने जाती थी। मिश्रा जी सरकारी बाबू थे. तो पैसों की तो खूब मौज थी। मिश्राइन जी स्वभाव से थोड़ी कटु थी। मिश्रा जी का बेटा सजल भी लगभग नौ साल का था और माँ बाप का एकदम लाडला। वो अक्सर मुनिया को खेल खेल में लात या थप्पड़ मार देता तब भी मिश्राइन जी उसे कुछ ना कहती बल्कि मुनिया को ही धमका देती। मुनिया बेचारी बस अपने इस अपमान को किस्मत समझ कर संतोष कर लेती। आज मुनिया की माँ बहुत बीमार थी तो मुनिया अकेले ही काम पर आई थी। रविवार का दिन था तो सजल भी घर पर ही था ओर मिश्राइन जी आज उसकी पसन्द का हलवा बना रही थी। देशी घी की महक से पूरा घर महक रहा था. मुनिया उस ख़ुशबू से सपनो की दुनिया मे चली गयी. उसे याद है दो साल पहले जब दुर्गा समिति वालो ने उसकी झुग्गी के पास जागरण कराया था तब वो भी अपने पापा के साथ प्रसाद लेने वहाँ गयी थी. लगभग तीस मिनट लाइन में लगने के बाद जब उसके हाथ मे हलवे का दोना आया था तो मानो उसे जहां की सबसे अनमोल चीज़ मिल गई हो। उस हलवे का स्वाद आज फिर से मुनिया की जीभ पर आ गया था. अभी वो उन सपनों की दुनिया मे ही तैर रही थी कि मिश्राइन जी की चिल्लाने की आवाज़ उसके कानों में पड़ी. मुनिया ओ मुनिया कहा मर गयी. देख यहाँ रसोई में कितना काम पडा है. ये लोग भी ना बस हराम की रोटी चाहिए. मिश्राइन जी गुस्से से लाल पीली हो गालिया बके जा रही थी। मुनिया घबराकर सपने से बाहर आई ओर झाड़ू को कोने में टिकाकर रसोई की तरफ भागी। जी आँटी जी मुनिया ने घबरा कर कहा. आंटी जी की बच्ची, बहरी है क्या? कब से चिल्ला रही हूं. कामचोर कही की. महीना पूरा होने पर तनख्वाह के लिए एक दिन की भी देर हो जाए तो तुम नीच लोगो का रोना शुरू हो जाता है. ओर काम करने में मौत आती है। मुनिया सिर झुकाए खड़ी थी. हलवे की मिठास में मानो किसी ने नमक घोल दिया हो। अब खड़ी क्या है रसोई में जा ओर बर्तन साफ कर मिश्राइन जी ने कड़क आवाज़ में कहा। मुनिया रसोई की तरफ बढ़ी तो उसने रसोई में वो कढ़ाई देखी जिसमे हलवा बना था. मुनिया की आंखों में अचानक चमक आ गयी आंटी जी की कही हर बात एकदम से ना जाने कहा फुर्र हो गई। मुनिया ने आगे पीछे देखा कि कोई है तो नही ओर फिर उस कढ़ाई को लेकर रसोई के फर्श पर बैठ कर अपनी नन्ही उंगलियों से कढ़ाई को चाटने लगी। कितना स्वाद बना था हलवा, कढ़ाई की खुरचन को चाटने में वो इतनी खो गई कि उसे ये भी याद ना रहा कि कब सजल उसके सामने आ खड़ा हुआ। सजल ने आते ही बैठी हुई मुनिया के मुँह पर इतना जोरदार थप्पड मारा की मुनिया संभल भी ना पाई ओर कढ़ाई उसके हाथ से छूटकर दूर जा गिरी। मम्मी देखो ये मुनिया क्या कर रही है। आवाज़ सुनकर मिश्राइन जी रसोई में आई. मुनिया अभी अपना गाल सहला ही रही थी कि इतने में मिश्राइन जी ने मुनिया के गाल पर तीन-चार तमाचे ओर जड़ दिये। मुनिया के गाल बिल्कुल लाल ओर आंखे सूज गयी थी। चोर कही की. अब रसोई से खाना भी चुराने लगी, राम जाने घर से क्या क्या चुराया होगा. मिश्राइन जी उसे घसीटते हुए घर के दरवाजे की तरफ ले गयी और बोलो कल से काम पर आने की जरूरत नही ओर कल अपनी माँ को भेजना। मुनिया सुबकती हुई वापस घर आ गयी और उसके बाद वो कभी मिश्राइन जी के घर नही गयी। 

मुनिया की माँ को मिश्राइन जी ने हज़ार गालिया दी. लेकिन दया कर के काम से नही निकाला। वैसे भी इतने कम पैसों में आजकल कौन काम वाली मिलती है। दो दिन बाद अष्टमी आने वाली है ओर शहरों में आजकल जिमाने के लिए कन्या कहां मिलती है। बड़े लोग तो वैसे भी अपनी बच्चियों को किसी दूसरे के घर खाना खाने बिल्कुल नही भेजते। मिश्राइन जी ने मुनिया की माँ से कहा कि परसो आठे के दिन मुनिया को ले आना. वो क्या है ना कि यहाँ ओर किसी के लड़की तो है नही तो कम से कम मुनिया को जिमा कर नेग तो हो जाएगा। जी दीदी ले आऊंगी. मुनिया की माँ ने सहमति में सिर हिलाया। 
अष्ठमी के दिन मुनिया के मना करने पर भी उसकी माँ जबरदस्ती मुनिया को मिश्राइन जी के यहाँ ले गई। आ गयी बिटिया, आ बैठ. मिश्राइन जी की आवाज़ में मानो मिश्री सी घुल गयी हो। मिश्राइन जी ने आज मुनिया के पैर धो कर उसके माथे पर रोली लगाई। सजल ओ सजल यहा आ ओर कन्या के पैर छू। सजल नाक और मुँह सिकोड़ते हुए वहाँ आया ओर मुनिया को हेय दृष्टि से देखते हुए बाहर खेलने चला गया। मिश्राइन जी सजल को जाता देख कर मद पूर्ण हँसी हँस दी। आजकल के बच्चे भी ना, बस अपने मन की ही करते है। बेटी खाओ ना, लो थोड़ा हलवा लो ना. आज तो तुम भगवती का रूप हो ऐसा कहते हुए मिश्राइन जी ने मुनिया की थर्माकोल की प्लेट में बड़ी कलछी से हलवा पलट दिया। वो क्या है घर के बर्तन में किसी कामवाली की लड़की को खाना नही खिला सकते ना। 

मुनिया प्लेट में पड़े हलवे को देख रही थी. उसे उस हलवे से नफरत हो चुकी थी। मुनिया ने कहा आंटी जी मुझे अभी भूख नही है. मैं इसे घर जाकर खा लूंगी। मिश्राइन जी ने बड़े प्रेम से मुनिया के पैर छुए ओर दक्षणा में 10 रुपया बड़े गर्व से मुनिया के छोटे खुरदरे हाथो में पकड़ाते हुए आशीर्वाद मांगा। जाते जाते मिश्राइन जी ने एहसान कर के चार पूरी ओर थोड़ा हलवा मुनिया के लिए दिया। 
मुनिया मिश्राइन जी के घर से उस हलवे ओर पूरी की थैली को लिये निकल आयी। अपनी माँ के साथ घर की तरफ जाते वक्त रास्ते मे बैठे भिखारी को वो थैली ओर दस रुपया पकड़ा कर वो संतुष्ट थी. उसकी आँखों मे चमक ओर चेहरे पर गज़ब की मुस्कान।
उधर आज मिश्राइन जी भी अपने द्वारा किये गए पूण्य कार्य के गर्व से थकी हुई अब आराम करने अपने कमरे में चली गयी।

गुलजार जिंदगी

सब कुछ मेरे मुताबिक तो नही यहाँ,

मगर सुकून है फिर भी की उसको खयाल मेरा है।

चाहते कब पूरी हुई है इस जहां में किसी की,,

चल तू ही बता जिंदगी, ये सवाल तुझसे मेरा है।।

ओर फिर तेरी ख्वाइशें भी तो हमेशा बढ़ती ही रही,

पता मुझे भी तो बता, कहाँ इनका डेरा है।

सुन बैठ कभी. बैठ कर बातचीत कर ले,,

एक बार ही बता दे जो कुछ हिसाब तेरा है।।

पता नही की कब तेरी आखिरी शाम हो जाए,

उत्सव उसका मना जो संग में सवेरा है।

कभी धूप, कभी छांव. कभी गिरना संभलना है,,

किरदार हूं मैं भी बस एक, रंगमंच का ये खेला है।।

“कोशिश करता हू की शिद्दत से इसे निभा पाऊं, 

मरने से पहले ए जिंदगी तुझे गुलजार बना जाऊ”